बेसहारा बच्चो की फिक्र किसे है

बेसहारा बच्चो की फिक्र किसे है

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आज किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत सारी की सारी कानून का उलंघन करने वाले बच्चो की उम्र को लेकर हो रही है, यानी किस उम्र तक किशोर न्याय अधिनियम को लागू करना उचित होगा और किस उम्र के बाद दंड प्रक्रिया संघिता लागू होनी चाहिए. इसी सिलसिले में कुछ चर्चा अपराध की प्रकृति को लेकर भी होती रही है. अनाथ बेसहारा व नशे की गिरफ्त में आनेवाले बच्चो के पुनास्थार्पण के प्रति न कानून और न ही देश और समाज ज्यादा चिंतित है. देखने में आ रहा है की आजकल नगरो और महानगरो की सड़को पर आनाथ और बेसहारा बच्चो की भरमार है. ये बच्चे आपको भीख मांगते अथवा पॉलीथीन बीनते आसानी से दिखाई दिए जायेंगे. अक्सर ये बच्चे नगरो की तेज दौड़ती गाड़ियों के सड़को पर रुकने पर हाथ फैला कर भीख मांगते दिखाई पड़ ही जाते है. इनमे केवल लड़के नहीं है नाबालिग लड़कियों भी बच्चो के इस अनाथ समूह में शामिल है. इस गुमनाम बच्चो का न खाने और न ही रहने का कोई ठिकाना है. ये सभी बच्चे औरो की दया पर जीवन जीने को मजबूर है. क्या देश और समाज को इनकी कोई फिक्र नहीं होनी चाहिए. पढाई के अभाव में ज्ञान के कमी में कितने अधिक बच्चे ऐसे जन्म दिए गए जो एक बरी समस्या उभरकर सामने आया है. कुछ मिल जाने की आस में सड़को पर घूमने वाले बच्चो का अपना कोई ठौड़ ठिकाना नहीं है इनकी अपनी कोई पहचान भी नहीं है. कई बार फुटपाथ अथवा फ्लाई ओवर की छत ही इनका घर होती है और सड़ा गला खाना इनका भोजन. आंकड़े बताते है कि देश में ऐसे बच्चो की संख्या दस लाख से भी ऊपर है. इनमे कुछ तो वे बच्चे है जिन्होंने परिवार की टूटन या माँ बाप की प्रताड़ना के कारण घर छोड़ दिया है. बाकि गरीब और आनाथ है जो या तो गरीबी या अपने मूल निवास से विस्थापित होने के बाद बेसहारा बनने को मजबूर हुए. ऐसे बच्चे या तो सड़को पर ही रात गुजारते है या रेलवे प्लेटफार्म को अपना ठिकाना बनाते है. इन बच्चो किशोरों का अपना परिवार न होने के कारण इनकी परिवरिश भी पूरी तरह दोषपूर्ण होती है. सामाजिक ज्ञान इनका सुन्य होने के कारण ये अच्छे या बुरे के बीच अंतर नहीं कर पाते देखने में आ रहा है की अपराधी ऐसे ही बच्चो को अपनी शरण में लेकर पहले उन्हें नशेड़ी बनाते है, फिर उनसे नशीले पदार्थो को तस्करी कराते है अथवा उन्हें बंधुआ बना कर या मारपीट करके उनसे अन्य अपराध कराते है. राष्ट्रीय अपराध रिकोर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते है कि देश में दो तिहाई से भी बाल अपराधी सोलह से अठारह वर्ष की आयु समूह में है इस से जुड़े आकड़े यह भी बताते है की पिछले सालो के मुकाबले 2017 में नाबालिग किशोर अपराधियों की संख्या में 28 फीसद का बढ़ोतरी हुआ है.

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