डिमेंशिया को लेकर देश में जारी होगा अपना गाईडलाइन

डिमेंशिया को लेकर देश में जारी होगा अपना गाईडलाइन

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नई दिल्ली: डेमेंशिया को आमतौर पर बुढापे की बिमारी माना जाता है. जिसमे इंसान छोटी छोटी चीजे भी भूलने लगता है. वर्ष 2007-08 में अमेरिका में हुए एक सर्वे के अनुसार 70 प्रतिशत लोगो ने इसे कैंसर से भी डरावनी बीमारी माना है. एक अनुमान के अनुसार देश में डेमेंशिया के एक करोड़ से भी ज्यादा मरीज है. लेकिन इसके बाद भी इसके इलाज के लिए देश में न तो कोई नेशनल प्रोग्राम है और न ही कोई गाईड लाईन. इसकी वजह से डेमेंशिया के मरिजो का इलाज पश्चिमी देशो में गाईडलाईन जारी होने वाला है. आरएमएल अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के वरिष्ठ डॉ. विकास ढिकव बताते है की सोसाइटी फॉर अल्जाइमर्स
एंड एंजिंग रिसर्च SAR इसके लिए देश भर में न्यूरो फिजीशियनो द्वारा डेमेंशिया के किए जा रहे इलाज का सर्वे कर रही है. इसके लिए देश भर में मौजूद करीब तीन से चार हजार न्यूरो फिजीशियनो द्वारा डिमेंशिया के किए जा रहे इलाज का सर्वे कर रही है. इसके लिए देश भर में मौजूद करीब तीन से चार हजार न्यूरो फिजीशियनो को ईमेल भेज दी है. जिसमे उनकी द्वारा लिखी जा रही दावा और ऊपचार के तरीको से सबंधित सवाल पूछे गए है. डाक्टरों को इन सवालो के लिए जबाव जनवरी के अंत तक देनी है. इन जवाबो के आधार पर फरवरी महीने के अंतिम सप्ताह में गाईडलाइन जारी किया जाएगा. सरकार ने स्वयं माना है कि डिमेंशिया के एक मरीज के इलाज पर प्रति महिने औसतन करीब 15 हज़ार रूपए खर्च आता है. लेकिन इसके बाद भी इन मरीजो के लिए सरकार के पास कोई नेशनल प्रोग्राम नहीं है. डॉ ढिकव का कहना है कि ऐसे मरीजो के लिए हर मेडिकल कॉलेज में मेमोरी क्लीनिक होना चाहिए. बुजुर्गो को बढ़ती उम्र के साथ ही अपनी क्रियाशीलता को बरकरार रखनी चाहिए. विश्व स्वास्थ संगठन ने भी वर्ष 2000 में माना था कि डिमेंशिया से बचने के लिए बुजुर्गों का एक्टिव रहना जरुरी है.

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