प्रकाश प्रदूषण एक नयी समस्या 

प्रकाश प्रदूषण एक नयी समस्या 

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“जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियासाइंसेज” के शोधकर्ताओं ने चेताया कि दुनिया में प्रकाश प्रदूषण (लाईट पॉल्यूशन) तेजी से बढ़ रहा है अगर इस पर नियंत्रण नहीं लगा तो आनेवाले वर्षो में इंसानों, जानवरों और पेड़ पौधे का जीवन चक्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है. शोधकर्ताओं ने बताया है कि अगर रातो को रोशन करनेवाली स्ट्रीट लाईट और अन्य साज सज्जा में इस्तेमाल हो रही कृत्रिम रोशनी को नियंत्रित नहीं किया गया तो इसके परिणाम भयावह होंगे. रात में प्रकाश की बढ़ती मात्रा पर्यावरण, हमारी सुरक्षा, उर्जा खपत और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है. आज विश्व की अधिकांश जनसँख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रकाश प्रदूषण की चपेट में है. खुले आकाश के नीचे रहने के बावजूद कृतिम प्रकाश की अतिशयता के कारण रात में आकाश को निहारना मुश्किल हो गया है. बढ़ते प्रकाश प्रदूषण के कारण अनेक प्रकार की समस्याए उत्पन्न हो रही है. शोधकर्ताओं की माने तो प्रकाश प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरनाक असर डाल रहा है जिससे इंसानों और जानवरों को नींद लेने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. अन्य जीव मसलन कीटो, मछलियों, चमगादडो, चिड़ियों व जानवरों की प्रवासन प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है. प्रकाश प्रदूषण का नकारात्मक असर पेड़ पौधे पर भी पड़ रहा है. अंधकार से इंसान की बढ़ती दूरी ने कई तरह की बीमारियों को जन्म दिया है. रात में भी प्रकाश के समक्ष होने से भी जो अप्राकृतिक है. एक्सपर्ट के मुताविक इंसानी शरीर में “मेलाटोनिन” नामक एक हार्मोन का निर्माण तभी संभव होता है जब नेत्रों को अंधकार का संकेत मिलता है. इसका काम शरीर की प्रतिरोधक क्षमता से लेकर कोलेस्ट्रोल में कमी अथवा अन्य अति आवश्यक कार्यो का निष्पादन है जो एक स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है. पक्षिओ और पशुओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव भी बात करे तो रात्रि में प्रकाश के कारण पक्षी समझ नहीं पाते है कि सुबह है या रात. कृतिम प्रकाश उन प्रवासी पक्षियों को भ्रमित करता है जो वर्ष के मौसम के अनुसार अपना स्थान परिवर्तित करते है. यह तथ्य है की पक्षी चाँद और तारो को देखकर ही दिशा का अनुमान लगाते है. लेकिन प्रकाशीय छेत्र से गुजरते वक्त उनके लिए दिशा का अनुमान असंभव हो जाता है. उसका नतीजा यह होता है कि वे गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंच पाते और कई बार तो रास्ता भटकने से प्रतिकूल मौसम की चपेट में आकर अपनी जान गवां देते है. एक आकड़े के मुताबिक 2012 से 2016 के बीच दुनिया में रात में कृतिम रोशनी वाले छेत्र में 2.2 प्रतिशत की सालाना दर से वृद्धि हुई है. एक अन्य शोध में 1992 से 2013 के बीच इसमे सालाना दो प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है. उम्मीद थी की सोडियम लाईटो की अपेक्षा एलईडी बल्बों के बढे इस्तेमाल से अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे संपन्न देशो में कृतिम प्रकाश की चमक में आएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जहां अमेरिका पहले जैसा ही रहा वही ब्रिटेन व जर्मनी में प्रकाश प्रदूषण पहले से अधिक गहराया है. ऐसा तब हुआ है जब शोध में इस्तेमाल उपग्रह का सेंसर एलईडी लाईट को नीले प्रकाश को मापने में असफल रहा है.

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