अनुवाद: हिंदी और तमिल में भी बोलता है डोरेमाँन 

अनुवाद: हिंदी और तमिल में भी बोलता है डोरेमाँन 

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हम यहां ओरहान पामुक के अल्केमिस्ट को हिंदी में पढ़ रहे है तो कही दूर देश के लोग रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि और प्रेमचंद्र के गोदान को हिंदी में. उत्तर भारत के बच्चे तमिल, तेलुगु, और मलयालम में देखते है, यह सब संभव है. अनुवाद के कारण आज अनुवाद का बाजार इतने अच्छे समय में है कि इस बाज़ार को शिकायत है कि अच्छे अनुवादक नहीं मिल रहे है. भारतीय अनुवाद परिषद् के महासचिव और प्रोफेसर निदेशक पूरनचंद टंडन के मुताबिक, भारतीय साहित्य को अनुवाद ने वैश्विक धरातल पर पंहुचा दिया है. आज अनुवाद भाषायी आवागमन का सेतु बन गया है. एक जमाना था जब अनुवाद को दोयम दर्जे का माना जाता था. लेकिन अब अनुवाद की महत्ता बढ़ रही है. आज अनुवादको को अग्रिम पंक्ति में रखा जाता है. साहित्यिक अनुवाद और उसकी जरुरत को आप किस तरह से देखते है. इस सवाल के जवाब में पूरनचंद ने कहा कि साहित्य संवेदनाओं को जीवित रखता है और जिस सभ्य समाज में संवेदनाओं का विस्तार होगा. जब हमें यह पता नहीं होगा कि कन्नड़ या उत्तर भारत का लेखक क्या लिख रहा है तो कैसे समभाव को समझ पायेंगे. राष्ट्रीय, सामाजिक, संस्कृतिक एकता के लिहाज से साहित्य के अनुवाद की जरुरत है. हम बड़े बड़े साहित्कारो, रचनाकारों, इतिहासकारों, दार्शनिको और उनकी रचनाओं के अनुवाद के जरिए ही समझ पाते है. जितना आसान किसी अनुदित पुस्तक या लेख को पढ़ना होता है उतना ही कठिन किसी कृति का अनुवाद करना है. अनुवादको का अनुवाद करते समय कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. अनुवादक डॉक्टर हरीश सेठी का कहना है अनुवादको के पास भाषा या सांस्कृतिक अंतर को अपनी भाषा में कैसे लाया जाए. यह चुनौती रहती है लेकिन इसके बावजूद आज अनुवाद के छात्रों की संख्या बढ़ रही है. अनुवाद पढने के लिए सालाना लगभग तीन हजार बच्चे पंजीकरण कराते है. अब अच्छे अनुवादको की मांग बहुत ज्यदा बढ़ गयी है. जिस तरह से अनुवाद की मांग बढ़ रही है ऐसे में अनुवादको की जिम्मेदारी भी चुनौतीपूर्ण होती जा रही है. क्युकि अनुवादक को सिर्फ भाषा के स्तर पर ही खुद को मजबूत नहीं करना होता बल्कि अनुवाद की तकनीक को भी समझना पड़ता है. आज अनुवाद करने के लिए कई ऐप्स आ गए है जिनसे अनुवाद करना आसान हो गया है. लेकिन हमें यह ध्यान देना होगा कि मशीनी युग में कृतिम ज्ञान से काम करते हुए अपनी ज्ञान का भी इस्तेमाल किया जाए. समय के साथ अच्छी टेक्नोलॉजी के आगवान के कारण भाषा की पंख लगे है. आतंरिक अनुभूति, सम्प्रेषण, एक जगह बैठे हुए दूसरे जगह के लोगो के दिमागों में क्या चल रहा है इसको पढ़ लेना केवल हिंदी भाषा से ही संभव है वह भी उच्चतम स्तर का ज्ञान होता है. दुर्भाग्य है की हिंदी की इस अमूल्य धरोहर को कितने लोग भाव नहीं देते लेकिन ये भी सत्य है की जैसी करनी वैसी भरनी होता है, उनके जीवनकाल में ही सब घटना घटती है फिर सब कुछ समाप्त हो जाता है. अंत भला तो सब भला इंसान के जीवन में बदलाव लाने का समय आता है लेकिन कुछ लोग समझ नहीं पाते है.

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