वैज्ञानिको ने खोजा लाखो हेक्टर धान की फसल को बचाने का तरीका

वैज्ञानिको ने खोजा लाखो हेक्टर धान की फसल को बचाने का तरीका

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देश में हर साल चार करोड़ हेक्टर जमीन से अधिक पर धान चावल की खेती होती है. जिसमे से करीब 20 फीसद फसल फंगल कवक से संबंधित रोगों की वजह से खराब हो जाती है. इस कई लाख हेक्टर धान की फसल को बचाने के लिए राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान NIPGR के वैज्ञानिको ने एक जीवाणु की पहचान की है. NIPGR के 19 वे स्थापना दिवस के मौके पर संस्थान के निदेशक डॉ रमेश वी सोंटी ने यह जानकारी दिया. इनके मुताबिक कवक की वजह से फसलो विशेषकर धान की फसल से कई विनाशकारी रोग हो जाते है जिससे फसल की बहुत बर्बादी होती है. राईजोक्तोनिया सोनाली नामक कवक की वजह से धान की फसल में सीथ ब्लाईट रोग हो जाता है. NIPGR के वैज्ञानिक डॉ गोपालजी झा और उनकी टीम ने कवक को खाने वाले एक जीवाणु की खोज की है. डॉ झा के मुताबिक यह जीवाणु धान की चार पांच दिन की पौध से प्राप्त किया गया है. यह जीवाणु धान के पौधो को रईजोक्तोनिया सोनाली से सुरक्षा प्रदान करता है. उनकी जांच में पाया गया कि जीवाणु कवक को मारने के लिए एक विशेष प्रोटीन का स्राव करता है. इस तकनिक को डॉ झा ने पेटेंट कराया गया है. उनके मुताविक अभी इसका प्रयोगशाला में सफल प्रयोग किया गया है. व्यवसायिक रूप से इसका इस्तेमाल करने में अभी कुछ समय और लग सकता है. यह प्रोटीन न सिर्फ पौधो के कवको का नाश करता है बल्कि मनुष्य में होनेवाले कवको को भी खत्म करता है. भविष्य में इसका उपयोग मनुष्य में होनेवाली विभिन्न बीमारियों के इलाज में भी काम आ सकता है. यह शोध हाल ही में नेचर कम्युनीकेशन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. अधिक पैदावार के लिए भारत में फास्फोरस उवर्रको का जमकर इस्तेमाल किया जाता है. जिसका ज्यदातर हिस्सा पानी में घुलकर तालाबों के पानी को दूषित करता है. NIPGR के वैज्ञानिक डॉ जितेंद्र्र गिरि और इनके टीम ने चावल के एक जीन की पहचान की है जो धान के पौधो को एक प्रोटीन के स्राव को मजबूर करता है जो जैविक फास्फोरस का अजैविक फास्फोरस में बदल देता है. डॉ गिरि का कहना है कि इससे फास्फोरस उवरक का उपयोग धीरे धीरे कम होगा. NIPGR के वैज्ञानिक डॉ नवीन बिष्ट ने भारतीय सरसों की एक ऐसी किस्म तैयार की है जो पहले से अधिक स्वादिष्ठ और पोषक तत्वों से भरपूर है. साथ ही इससे बनी खली जानवरों के लिए भी अच्छी है. भारतीय सरसों के बीज में ग्लुकोसिनौलेट्स नामक पदार्थ अधिक मात्रा में होता है जो पोषण विरोधी और स्वाद को कम करनेवाला है. डॉ बिष्ट की टीम ने सरसों से इस पदार्थ की मात्रा को कम करने में सफलता प्राप्त की है. इसके लिए इस टीम ने सिर्फ एक जीन में बदलाव किया है. सभी कार्य काफी महत्वपूर्ण है.

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