डॉक्टर और मरीज का औसत रिश्ता दो मिनट

डॉक्टर और मरीज का औसत रिश्ता दो मिनट

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नई दिल्ली : भारत में डॉक्टर-रोगी अनुपात पर ध्यान देने की जरुरत है. इससे हर मरीज को समुचित परामर्श का समय तय होगा और चिकित्सको पर दवाब कम होगा. हाल में एक अध्ययन के मुताबिक भारत में प्राथमिक उपचार से जुड़े चिकित्सक हर रोगी के साथ औसतन लगभग दो मिनट ही बिता पाते है. यह प्रथम श्रेणी के विकसित देशो के विपरीत है जहां परामर्श समय 20 मिनट से भी अधिक होता है. एक संक्षिप्त परामर्श अवधि न केवल रोगी की देखभाल को प्रभावित करती है, बल्कि सलाहकार चिकित्सक के कार्यभार और तनाव को भी बढ़ाती है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का कहना है की महज समय कम होने से नतीजा यह होता है कि उचित परामर्श के आभाव में दवाओं पर अधिक खर्च करना पड़ता है, एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक इस्तेमाल किया जाता है और डॉक्टरों के साथ रिश्ते भी खराब होते है. जनता की सोच में अब काफी बदलाव आ चुका है डॉक्टर रोगी संबंध अब पहले जैसे नहीं रहे है. जहां मरीज सौ फीसद डॉक्टर के परामर्श पर निर्भर थे. अब मरीज अपने इलाज के फैसले में डॉक्टरो के साथ बराबर साझीदार बनना चाहते है जो एक गाईड के रूप में कार्य करता है और निर्णय लेने की सुविधा देता है. रोगी स्वायत्तता अब भी चिकित्सा नैतिकता के सिधान्तों के मामले में सबसे आगे है. आएमए के अध्यक्ष केके अग्रवाल ने कहा कि भारत में आज भी मरीजों और प्राथमिक देखभाल चिकित्सको की संख्या के बीच एक भारी असमानता मौजूद है. नतीजतन मरीजों को डॉक्टरों के साथ कम समय मिल पता है. भीड़ से भरी ओपीडी का मतलब है कि चिकित्सक एक ही समय में दो या तीन मरीजों से एक साथ बात कर रहा होता है. इससे मरीज़ के इलाज और देखभाल में उसे समझौता करना पड़ता है. भारतीय लोगो के मन में अभी भी ये धरना बनी रहती है कि कौन अच्छा डॉक्टर है कौन नहीं. महासचिव डॉक्टर आरएन टंडन ने कहा की लोग मानते है कि कम फीस लेता हो और हर समय उपलब्ध रहता हो ऐसे डॉक्टर बेहतर होते है. डॉक्टर अग्रवाल ने कहा कि काम और घर पर दोनों स्थानों पर मांग अधिक होती है कारण महिला डॉक्टरो में थकान अधिक होने की संभावना रहती है. विशेषज्ञ डॉक्टरो की संख्या सीमित है कारण उन्हे अधिक घंटे काम करना पड़ता है. चिकित्सकीय भूलो का जोखिम भी बढ़ जाता है. डॉक्टर तनाव दूर करने के लिए स्मार्ट काम कर समय निकाल सकते है और अपने पसंद के खेलो और अन्य मनोरंजन कर सकते है ताकि तनाव से दूर रह सके.
भारत जैसे बड़े जनसँख्या वाले देश में मरीज और डाक्टरों का अनुपात बनाना एक चुनौती है इसमे काम किए जाने कि आवयश्कता है. दूसरे तरफ लोगो को प्राचीन प्रणाली को अपनाने की जरुरत है जैसे योग, सुबह का व्यायाम शामिल है. प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है इसे भी कंट्रोल करने की अति आवश्यकता है जिसमे जनता कि दैनिक भागीदारी भी सामिल है.

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