सेठ लख्मीचंद ने दो बार खरीदा था ताजमहल

सेठ लख्मीचंद ने दो बार खरीदा था ताजमहल

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विजय सेठ कहते है हमारे पूर्वज मथुरा के लख्मीचंद सेठ जी ने ताजमहल को नष्ट होने से बचाया तब ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था. कंपनी को पैसे की जरुरत थी इसलिए आगरा में सात महत्वपूर्ण स्थानों की नीलामी हुई थी, उसमे ताजमहल भी था, पांच स्थान की बोली की रकम में सेठजी अव्वल थे. अगर ब्रिटिश संसद ताजमहल की बिक्री पर रोक नहीं लगाती तो ताज के मालिक हमारे पूर्वज ही होते. आगरा के विश्व प्रसिद्ध ताजमहल को बुरी नज़र से देखने और आलोचना करने का काम बहुत पुराना है. कभी गोरी हुकूमत ने इसे दो बार बेचने की कोशिश की, ताजमहल को मथुरा के सेठ लख्मीचंद ने दोनों बार खरीद लिया लेकिन जनता के विरोध के कारण कब्जा न ले सके. लख्मीचंद ने पहले १.५ लाख रूपए में खरीदा और दूसरी बार ७ लाख रूपए में खरीदा. यह बात सन १८३१ की है.
इतिहासकारों के मुताबिक, मुगल बादशाह साहजहां ने ताजमहल को सन १६३२ में बनबाना सुरु किया था. २१ साल तक २५ हजार मजदूर उस जमाने के जाने माने पेंटरो और कलाकारों के साथ रातदिन बनाने में जुटे रहे. आज ताजमहल के आसपास की बस्तियों में जो बाशिंदे है, वे इस अजूबे को बनाने वाले मजदूरों के वंशज ही है. पिछले दिनों भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा ताजमहल के खिलाफ की गयी बयानबाजी ने दुनिया भर के ताज प्रेमियों को मानो सोते से जगा दिया है. फिरंगी जमाने में ऐसा ही एक तूफ़ान गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेटिंग की हरकतों से आया था. बेंटिंग हिन्दुस्तान में सिर्फ दो साल १८३३ से १८३५ तक रहा उसे इमारतो में जड़ी कीमती चीजों पर उसकी बुरी नज़र जरुर रहती थी. उसने कीमती पत्थरों को इंग्लैंड ले जाने की योजना बनाई उसने अपने खास मथुरा के सेठ लख्मीचंद को मात्र १.५ लाख रुपए में ताजमहल की मालिकाना सौप दिया. लेकिन मजदूरों ने कड़ा विरोध कर उन्हें वैरंग लौटा दिया. असल में विरोध करनेवाले वे लोग थे जिन्होंने रातदिन एक करके ताजमहल को बनाया था. बेंटिंग आहत जरूर हुआ लेकिन उसने ताजमहल को बेचने के मंसूबो को अपने सीने में दवाए रखा. अपने योजना को नया रूप देते हए कलकत्ता के एक अखबार में ताजमहल की नीलामी का विज्ञापन प्रकाशित कराया और नीलामी की तारीख २६ जुलाई १८३१ तय की इतिहासकार आर रामनाथ और अंग्रेजी लेखक एचजी केन्स के मुताबिक नीलामी में मथुरा और राजस्थान से कई सेठ आए लेकिन मथुरा के सेठ लख्मीचंद की सबसे अधिक बोली सात लाख रूपए सबसे ऊपर रही बेंटिंग को यह रकम कम लगी और बोली को निरस्त कर दी गई और ताजमहल इस बार भी न बिक सका. जिद्दी लार्ड ने ताजमहल की बिक्री की योजना को यही विराम नहीं दिया. वह अपने हिंदुस्तानी सेठ साहुकारो से बातचीत करता रहा ताकि ताजमहल की ज्यादा से ज्यदा कीमत वसूली जा सके. इसकी खबर किसी तरह इंग्लैंड की संसद तक पहुच गई. लंदन की संसद ने बेंटिंग की इस योजना को मूर्खतापूर्ण योजना का दर्जा देकर ऐसा न करने की हिदायते दी. इसके बाद सात फरवरी १९९० को लार्ड कर्जन ने ताजमहल परिसर में हिन्दुस्तानी अमीरों को बुलाकर कीमती पेंटिंग और ताजमहल की दीवारों में जड़े पत्थरों को नीलाम कर दिया. कहते है लार्ड वारेन हेस्टिंग की बुरी नज़र से भी ताज नहीं बचा. हेस्टिंग ताजमहल की दीवारों में जड़े हीरे मोतियों को निकालकर इंग्लैंड ले गया. अंग्रेज़ जबतक भारत में रहे, ताज की तक़दीर अधर में रही. देश के आज़ाद बनाने के बाद भारत सरकार ने फिर शान बख्शी और आज वह दुनिया के सात अजूबे के तौर पर विख्यात है.
सबसे बड़ी बात की कितना कष्ट उठाकर मजदूरों ने ताजमहल बनाई कितने जान गयी होगी सिर्फ एक प्रेम के निशानी के लिए. प्रेम अमर होता है भावनात्मक या शारीरिक होता है इसको यादगार बनाने के लिए एक लेख, या किताब ही काफी है ये किताब या लेख आनेवाली पीढ़ी दर पीढ़ी को हमेशा के लिए याद दिलाती रहेगी. लोगो का शोषण करके बड़ा अवंडर खड़ा करना और हमेशा पैसा कमाते रहना कहां की बुद्धिमानी है अन्य लोगो को परेशानी भी होती रहती है. शोषित लोग आज भी शोषण हो रहे है हमें शोषित लोगो को हर तरीके से आत्मनिर्भर बनाने है इस पर काम करने की सबसे ज्यदा जरुरत है.

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